मटर न तोड़ें किसान
गांव-गांव में मुनादी…!
, जबलपुर

एक जिला एक उत्पाद में शामिल जबलपुर का हरा मटर इस बार शुद्ध तमाशा बन कर रह गया है। मंडी में मटर की आवक को रोकने के लिए पाटन, शहपुरा, चरगवां क्षेत्र के सैकड़ों गांव में कोटवारों ने मुनादी करते हुए कहा कि जिन किसानों ने खेत में मटर की फसल लगाई है, वह अगले कुछ दिनों तक मटर की तुड़ाई न करें। जिले की सभी मंडियों में मटर खरीदी की स्थिति बेहद खराब है। मंडी में मटर की आवक कम होते ही मटर की कीमत में उछाल और तुलाई के लिए समुचित व्यवस्था मंडी प्रबंधन द्वारा बनाई जा रही है। किसानों से गुजारिश है कि संपूर्ण व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करें। इधर नाराजगी के चलते मंडी में पहुंचे मटर की खरीदी व्यापारियों ने आज नहीं की है।
हाल ही में कृषि उपज मंडी से लेकर शहपुरा-सहजपुर तक किसानों द्वारा मंडी और सड़क पर किए गए बवाल से हालात कानून व्यवस्था पर बन आई थी। इसके बावजूद जिला प्रशासन द्वारा इस एंगल से कोई सुध नहीं ली जा रही। व्यापारी संघ वालों
प्रोसेसिंग यूनिट के नाम पर चीटिंग
हालत यह है कि मटर प्रोसेसिंग यूनिट के लिए
तरस रहे जबलपुर जिले में ले-देकर एकमात्र यूनिट संचालित है जबकि आवश्यकता कई यूनिट्स की है। ऐसे में जानकार यह कह रहे हैं कि मटर फेस्टिवल के नाम पर दिखावा करने वाला प्रशासन यदि हो सके तो एग्रीकल्चर और हार्टीकल्चर के बीच में ही समन्वय बना दे मटर के हालात सुधर जाएंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि ना तो इन्फ्रास्टक्चर के नाम पर कोई सुधार हो रहा है ना ही दूसरे राज्यों से कोई लिंकेज बनाई जा रही है।
रबी में गिनें या खरीफ में

का कहना है कि विगत दिनों हुए तमाशे से हमारा कई ट्रक मटर सड़ गया और जो नुकसान हुआ है उसका मुआवजा कौन देगा। इन हालातों का नतीजा यह हो गया है कि इस बार जबलपुर का हरा मटर ना हैदराबाद जा पा रहा है ना मुम्बई।
जानकारों के मुताबिक मटर रखी और खरीफ फसलों के बीच में बोया जाता है इसलिए गिरदावरी में इसका कोई कॉलम ही नहीं होता है। इसके चलते अनुमानित आंकड़ों की दम पर पूरा काम किया जाता। ता है जबकि कृषि विभाग के मुताबिक पिछली बार 38 हजार 600 हैक्टेयर रकबा रहा जबकि उसके पिछले 39600 हैक्टेयर में मटर की बुवाई हुई थी। हालत यह है कि मटर को हार्टीकल्चर का सब्जेक्ट बता कर कृषि विभाग वाले हाथ खड़े कर रहे हैं और हार्टीकल्चर को कोई मतलब नहीं है।
किसान व्यापारियों पर लगाते हैं आरोप किसान व्यापारियों को 5% कमीशन भी देते हैं इसके बाद भी मंडी में कोई ऐसी व्यवस्थाएं नहीं है जिससे किसानों को सुविधा हो सके किसानों का माल ओने पौने दाम पर खरीद लेते हैं यहां तक की ₹1 से ₹2 किलो मे क्या बचेगा
किसान को जबकि किसान 6 से 7 रुपए खेत में ही खर्च करके आता है
चार से पांच दिन हो गए हैं मंडी बंद है जिससे किसानों को मटर में भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है यहां तक की किसानों का मटर खेत में खराब हो गया है जिससे किसानों की हालत बहुत खस्ता होती जा रही है यहां तक की प्रशासन भी ध्यान नहीं दे रहा है


