जबलपुर मध्यप्रदेश

कैंट बोर्ड चुनाव का इंतजार सभी को, होंगे कब, पता नहीं किसी को
जबलपुर, पंचायतों और नगरीय निकायों की चुनाव प्रक्रिया निष्पादित होने के बाद अब छावनी परिषद के चुनाव को लेकर उत्सुकता बढ़ने लगी है। यद्यपि इन चुनावों को लेकर कोई कार्यक्रम नहीं आया है, लेकिन यहां के नेताओं और आम नागरिकों में अपने लोकतांत्रिक अधिकार को लेकर उम्मीदें गहराने लगी हैं। छावनी परिषद क्षेत्र के राजनेताओं का कहना है कि उनको लोक-प्रतिनिधित्व के अधिकार से वंचित रखना सही नहीं है।
छावनी-परिषद का कार्यकाल फरवरी 2020 में पूरा हो चुका था। इस तरह से फरवरी 2020 से वहां कोई भी चुनी हुई बाडी नहीं है। करीब ढाई साल का समय ऐसे ही बीत चुका है। इसी बीच दो साल का वक्त कोविड की भेंट चढ़ गया। अब जब कि सभी तरह के चुनाव होने लगे हैं ऐसे में कैंटोन्मेंट क्षेत्र के नेताओं का भावनाओं का भी कुलांचे भरना स्वाभाविक ही है। लेकिन लगता नहीं कि यहां के नेताओं को किस्मत आजमाने का मौका जल्दी मिलने वाला है। जानकारों का कहना कैंटोन्मेंट एक्ट में बदलाव किया जाना है। इसकी प्रक्रिया भी प्रचलन में है, लिहाजा बिना एक्ट में उचित एवं आवश्यक संशोधन हुए बिना यहां चुनाव होना संभव नहीं है। अभी तक यहां अंग्रेजों के जमाने का एक्ट ही अमल में लाया जा रहा है।
अन्य कैंट क्षेत्रों में भी हालात ऐसे ही
देश में कुछ 62 कैंट एरिया हैं। सभी छावनी परिषदों में एक जैसी विडंबना है। कहीं भी चुनाव नहीं हो पा रहे हैं। करीब साल भर पहले मध्यप्रदेश हाई कोर्ट में इस संबंध में एक याचिका भी लगाई गई थी, जिसकी अंतिम सुनवाई शेष है। याचिकाकर्ता अमर चंद बावरिया ने बताया कि छावनी परिषद के चुनाव नहीं होने की वजह से यहां अफसरशाही हावी है। लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हो रहा है। इस विषय पर चर्चा करने के लिए कैंट सीईओ के मोबाइल परअनेक मर्तबा काल की गई, लेकिन उनका फोन नहीं उठ पाया।
संयोग से बच गई थी पिछली परिषद
कानूनी पेचीदगियों की वजह से इससे पहले कुछ कैंट बोर्डों में तो चुनाव के बाद परिषदें भंग हो चुकी हैं। जबकि जबलपुर में ही 2008 में मतदान से ऐन दो दिन पहले चुनाव प्रक्रिया रोक दी गई थी। उस दौरान 15 मई 2008 को मतदान होना था, लेकिन 13 मई को चुनाव प्रक्रिया को रोक दिया गया था। इसके बाद 2009 और 2015 में चुनाव हुए। 2015 में भी रिजल्ट आने के बावजूद प्रक्रिया रूकने वाली थी, लेकिन उस समय तक शपथ ली जा चुकी थी, इसलिए उस चुनी हुई बाडी को अपना कार्यकाल पूरा करने का मौका मिल गया। जबकि पचमढ़ी कैंट सहित कई अन्य छावनी परिषदों के चुनाव निरस्त कर दिए गए थे।
सब कुछ रक्षा विभाग के हाथ
इस मामले में जो भी कुछ होना है रक्षा मंत्रालय स्तर से होना है, वह भी लखनऊ स्थित डीजी मुख्यालय की अनुशंसा के आधार पर। बताया जाता है कि देश की सभी 62 छावनी परिषदों के उपध्यक्षों और प्रशासनिक अधिकारियों की एक कमेटी बनी थी, जिसने कैंटोन्मेंट एक्ट में बदलाव के लिए 16 बिन्दु तय किए थे। उक्त प्रस्ताव मंजूरी के लिए रक्षा मंत्रालय के पास पड़ा है।
कैंटोन्मेंट एक्ट में आवश्यक बदलाव हुए बिना चुनाव संभव नहीं हैं। अगर होते भी हैं तो उन पर कोई भी रोक लगवा सकता है। ऐसा पहले भी हो चुका है। इसलिए एक्ट में जल्द से जल्द बदलाव करवा कर चुनाव का रास्ता साफ किया जाना चाहिए।
-अमित अग्रवाल, पूर्व पार्षद कैंट
केंद्र सरकार और अफसर नहीं चाहते कि छावनी परिषद में चुनाव हों। चुनाव नहीं होने की वजह से छावनी परिषद में अफसरशाही हावी है। अंकुश लगाने वाली या रोक-टोक करने वाली कोई बाडी है नहीं। इसलिए मनमाने तरीके से काम हो रहे हैं


