
नरसिंहपुर
वह वीर और साहसी थे, धार्मिक प्रवृत्ति के साथ ईश्वर में आस्था रखने वाले थे, प्रकृति से उन्हें प्यार था तो वह भारतभूमि के हृदय स्थल चले आए, वह उत्तरप्रदेश से आए और उन्होंने अपने लिए बेहद शांत क्षेत्र चुना, उन्हें सतपुड़ा और विंध्याचल पर्वत मालाओं की गोद में हरी-भरी उपजाऊ भूमि से परिपूर्ण छोटा सा खेड़ा गड़रिया खेड़ा भा गया। नर्मदा के किनारे कछवारे जल व वन सम्पदा ने उन्हें मोहित कर लिया। वह उत्तरप्रदेश के बृज क्षेत्र के खिरवार जाट शासक थे जो 17वीं शताब्दी में मध्यप्रदेश चले आए, जब वह यहां आए तो आज का नरसिंहपुर उस समय का गड़रिया खेड़ा था, यहां पिण्डारे कब्जा किये थे जो आस-पास के क्षेत्रों में लूटपाट करते, व्यापारियों के जान-माल को हानि पहुंचाते। खिरवार जाटों की वीरता और साहस के कारण पिण्डारे ज्यादा दिन यहां नहीं टिक सके और पिण्डारे अपना बोरिया बिस्तर समेटकर भाग गए। उस समय खिरवार जाटों को भोंसले बहादुर की उपाधि से नवाजा गया। गड़रिया खेड़ा की भूमि पर 1782 में राव जगन्नाथ नामक खिरवार गोत्र के जाट सरदार नरसिंहपुर आए, मध्यप्रदेश में खिरवार को खिनवाल के नाम से जाना जाता है। उनके आराध्य भगवान नृसिंह थे तो उन्होंने यहाँ भगवान नृसिंह के दो मंदिर बनवाये और गड़रिया खेड़ा को नाम दिया नरसिंहपुर… उन्होंने छोटे से गड़रिया खेड़ा को नरसिंहपुर शहर बनाया, लम्बे समय तक उन्होंने यहां शासन भी किया। आज जो नृसिंह मन्दिर हम देख रहे हैं 18वीं शताब्दी के दौरान इस मंदिर का निर्माण जाट सरदारों द्वारा किया गया और भगवान नरसिम्हा की प्रतिमा स्थापित की गई, तबसे यह दर्शनीय स्थल बन गया। नरसिंहपुर मंदिर एक ऐतिहासिक मंदिर है। यहाँ पर स्वामी नरसिंह भगवान की मूर्ति है, जो बहुत प्राचीन है। नरसिंह मंदिर के कारण ही इस जिले को नरसिंहपुर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में एक भूमिगत सुंरग भी है, कहा जाता है कि यह सुरंग कई किलोमीटर लंबी है। कुछ वर्ष पूर्व तक नरसिंह जयंती के दिन यह सुंरग आम नागरिकों के लिए खोली जाती रही, लेकिन सुरक्षा कारणों से यह सुरंग अब बंद रहती है। मंदिर में भगवान नरसिंह की बड़ी प्रतिमा विराजित है, जिसके दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। भगवान नरसिंह भगवान विष्णु का एक मानव अवतार है, जिनका सिर शेर का है और धड़ मानव का है। भगवान नरसिंह ने मानव कल्याण के लिए इस पृथ्वी पर अवतार लिया। मंदिर की एक और विशेषता यह है कि इस मंदिर के एक स्तंभ में नरसिंह भगवान की प्रतिमा बनी हुई है, इसी स्तम्भ के आधार पर पूरा मन्दिर निर्मित है। भगवान नरसिम्हा की मूर्ति को ऐसे चमत्कारी कोण पर रखा गया है, कि आप मूर्ति को मंदिर के अंदर खड़े होकर देखें या सड़क से सौ मीटर दूर से खड़े होकर दर्शन करें तो भी आपको मूर्ति का स्वरूप एक जैसा ही दिखाई देता है। मंदिर के पीछे तालाब भी बनाया गया है।
मान्यता तो यह भी है कि भगवान श्री नृसिंह तीन प्रहरों में तीन रुपों में दर्शन देते हैं, प्रत्येक प्रहर उनका रूप परिवर्तित हो जाता है। मन्दिर का तलघरा भीषण गर्मी में भी आपको एयर कंडीशनर का एहसास कराता है। नरसिंह मन्दिर 5 मंजिलों में विभक्त है, गर्भगृह के ऊपर एवं नीचे दो-दो मंजिलें हैं, मन्दिर में विराजित भगवान नरसिंह की प्रतिमा के साथ भगवान श्री लक्ष्मीनारायण, श्री लक्ष्मी नरसिंह व भक्त प्रह्लाद की नयनाभिराम प्रतिमाएं यहां स्थापित हैं। जाट सरदारों ने इस धरा को बहुत प्यार से सहेजा, खुद के लोगों के अलावा सर्वधर्म समभाव की भावना से सभी जाति, वर्ग के लोगों को समान रूप से स्वतंत्रता से रहने और जीवन यापन करने के लिए जगह दी, सबको सम्मान दिया तब कहीं जाकर यह गड़रिया खेड़ा खूबसूरत नरसिंहपुर बना। आप चाहे बार-बार इस वाक्य का प्रयोग करें कि पढ़ा लिखा न होय पर नरसिंहपुरिया होए… लेकिन यह बड़ी बात है कि जाट सरदारों ने कम पढ़े लिखे होने के बावजूद इस भूमि पर सभ्य समाज की बुनियाद रखी, शायद यही वजह है कि बाद में नरसिंहपुर जिला पूर्ण साक्षर कहलाया। जाट सरदारों की नस्लों ने यहां के बाशिंदों को खेती करना, कछवारे लगाकर सब्जियां उगाना, मवेशी पालन, अनाज का व्यापार करना सिखाया। उन्होंने दबे कुचले शोषित वर्ग को आर्थिक रूपसे मजबूत बनाया, उनकी मदद की, उन्होंने बताया कि जीवन कैसे जिया जाता है, उन्होंने मानव जाति को अमन चैन व एकता का संदेश दिया, उन्होंने शहर बसाने का साथ ही एक ऐसे समाज का निर्माण भी किया जिसमें सिर्फ मुहब्बत बसे… वैमनस्यता, कटुता और शत्रुता की कोई जगह न हो। वह जाट विकसित सभ्यता की पहचान थे, कृषि के उन्नत तरीके जानते थे, वह मवेशियों की बेहतर देखभाल करने वाले थे, मकानों को घरों की शक्ल देने वाले और वक्त आने पर जान की बाजी लगाने वाले भी थे। उन्होंने खून के सम्बन्धों की जगह मानवीय रिश्तों को महत्व दिया और यही कारण है कि आज नरसिंहपुर जिला गंगा जमुनी तहजीब के साथ सभी वर्ग समुदाय की सुख शांति के लिए जाना जाता है। वह जाट नहीं थे, वह एक ऐसी सभ्यता थे जिन्हें प्रकृति से प्यार था… हवा, पानी, आसमान, अग्नि और भूमि से बने वह ऐसे मनुष्य थे जो भरोसे की पहचान बने, उन्होंने व्यापार को बढ़ावा दिया, पुण्य और पाप के फर्क को समझते हुए दान के महत्व को बताया। उन्होंने गड़रिया गांव को भगवान नृसिंह की नगरी बनाया। वह भगवान नृसिंह के उपासक ही इसलिए थे ताकि समाज में व्याप्त अत्याचार, पापाचार को खत्म कर मुहब्बत की आबोहवा का मिजाज बदलें। आपको यह बताना भी जरूरी है कि नरसिंहपुर की जाट समाज अपने रीति-रिवाजों में भी समय के हिसाब से बदलाव करती रही है, मृत्य भोज जैसी परम्परा को समाज ने सहूलियत के हिसाब से कम कर दिया है। आपको यह जानकर खुशी होगी कि जाट समाज में अन्य जाति या धर्मों को लेकर ऊंच नीच का भाव भी नहीं है जो उनके द्वारे आता है बराबर सम्मान पाता है, समाज सबको अंगीकार और स्वीकार करता है।
आज जब हम भगवान नृसिंह के प्रकटोत्सव को मना रहे हैं तो बाजिव है कि उन महान जाट सरदारों का जिक्र भी किया जाए जिनके कारण हमारे शहर को धार्मिक पहचान मिली, आज नरसिंहपुर जिन खुशहाल जिलों में गिना जाता है तो यह उनकी ही देन है जिन्होंने इसे बसाया बनाया और पल्लवित किया। यहां का प्रत्येक बाशिंदा कृतज्ञ है उन जाट सरदारों और उनकी नस्लों का जिन्होंने 17वीं शताब्दी से लेकर 20वीं सदी तक नृसिंह धरा को पहचान दी और समरसता के साथ मनुष्यता से मुलाकात कराई। नरसिंह जयंती का महत्व इस कारण और बढ़ जाता है कि जाट समाज ने सभी को जोड़कर नरसिंह महोत्सव को एक नया स्वरूप देने का मार्ग प्रशस्त किया। यही कारण है कि शासन- प्रशासन से लेकर हर तबके का व्यक्ति नरसिंह महोत्सव से जुड़ गया है। नरसिंहपुर जिले के प्रत्येक नागरिक के लिए यह गर्व का विषय है कि वह भगवान नृसिंह के जिले का नरसिंहपुरिया है, नगर देवता के जिला गौरव दिवस पर गौरवमयी इतिहास की आप सभी को जय नृसिंह की…
नरसिंहपुर जिले के गौरव भगवान नृसिंह के प्राकट्योत्सव पर आप सभी सादर आमंत्रित हैं


