आखिर फिर बाबू को बदलकर दामन बचाने की कोशिश,
जिला पंचायत की हास्यास्पद कार्यवाही,
उमरिया। जिला पंचायत उमरिया हरदम नित नए कारनामों के लिए चर्चा में बना रहता है। इस बार भी ऐसा ही हास्यास्पद आदेश चर्चा का विषय बना हुआ है।
मामला जिला पंचायत की एक शाखा के अदने से बाबू को बदलने का है। लेकिन इस तबादले के जरिए मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने अपने दामन को पाक-साफ बताने की कोशिश की है।
मालूम हो कि पिछले दिनों जिला पंचायत से सचिवों को एक ग्राम पंचायत से दूसरी ग्राम पंचायत में पदस्थापना के आदेश जारी किए गए थे। लगभग सभी जगह उनका क्रियान्वयन भी हो गया था। लेकिन साहब की कलम की स्याही सूखी भी नहीं थी कि उन्हीं सचिवों को दोबारा पूर्व पदांकित ग्राम पंचायतों का प्रभार सौंपने का आदेश जारी कर दिए गए।
जिला पंचायत इस फेरबदल के बाद समाचार पत्रों की सुर्खियों में आई। अपनी विश्वसनीयता पर उठ रहे सवालों से बचने के लिए जिला पंचायत के मुखिया ने इस पूरे दोष की जिम्मेदारी एक बाबू पर डाल दी और उसे बदल दिया।
ध्यान देने योग्य है कि जिस बाबू को अभी बदला गया है, उनकी पदस्थापना भी इसी तरह जिला पंचायत के एक आदेश के समाचार पत्रों में खुलासे के बाद हुई थी। अब जब फिर गड़बड़ी उजागर हुई तो पहले वाले को बैठा दिया गया है। यह तबादला भी एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर माना जा रहा है।
सवाल ये उठता है कि जिला पंचायत के नियम विरुद्ध आदेश किसी बाबू की देन नहीं हो सकते। और अगर मान भी लिया जाए तो दोबारा उसे उसी शाखा का प्रभार क्यों दिया जाता है? अगर जिला पंचायत का अमला साहब की अनुमति के बिना तबादला आदेश जारी कर सकता है, तो अनुशासनहीनता पर कठोर कार्यवाही करनी चाहिए। न कि एक टेबिल से दूसरे टेबिल।
जाहिर है कि जिला पंचायत में होने वाले कारनामे किसी बाबू की बिसात पर नहीं, साहब की हुकूमत पर चलते हैं। बाबू को भी साहब की यह का
र्यशैली प्रिय लगती है। साहब कम से कम जिला पंचायत के बाहर का रास्ता तो नहीं दिखाते। साहब की भी मौज, बाबू की भी।
अखिलेश द्विवेदी की रिपोर्ट
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