हादसे के बाद हंगामा करने वाले गौवंश को गौशालाओं तक पहुंचाने में क्यों नहीं दिखाते सक्रियता?
नरसिंहपुर/गाडरवारा/करेली/गोटेगांव। जिले के स्टेट हाईवे 22, 44, 45 सहित फोरलेन मार्गों पर बड़ी संख्या में गायों और अन्य गौवंशीय पशुओं के झुंड आसानी से देखे जा सकते हैं। सवाल यह है कि जब गौ संरक्षण के नाम पर जिले में अनेक गौशालाएं संचालित हैं, जिन्हें दान, अनुदान और सरकारी योजनाओं से सहायता मिल रही है, तो फिर यह गौवंश सड़कों पर क्यों भटक रहा है?
सड़कें वाहनों के आवागमन के लिए बनाई गई हैं। वाहन चालक रोड टैक्स देकर इन मार्गों का उपयोग करते हैं, लेकिन सड़कों पर बैठे या घूमते आवारा मवेशियों के कारण आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं। कई मामलों में गौवंश घायल हो जाता है या उसकी मृत्यु तक हो जाती है, वहीं वाहन चालकों और यात्रियों की जान भी जोखिम में पड़ती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि गौशालाओं का उद्देश्य निराश्रित और आवारा गौवंश का संरक्षण है, तो फिर बड़ी संख्या में पशु सड़कों पर क्यों दिखाई देते हैं? गौ संरक्षण के नाम पर संचालित संस्थाओं और गौशालाओं की कार्यप्रणाली की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि कहीं गौशालाओं के नाम पर प्राप्त भूमि, अनुदान और संसाधनों का उपयोग केवल कागजों तक तो सीमित नहीं है।
आरोप यह भी लगते रहे हैं कि कई स्थानों पर केवल दुग्ध उत्पादन करने वाले पशुओं को रखा जाता है, जबकि बूढ़े, बीमार या गैर-दुग्धीय गौवंश को खुला छोड़ दिया जाता है। यदि यह सच है तो यह गौ संरक्षण की भावना के विपरीत है।
एक अन्य गंभीर विषय यह भी है कि बड़े नगरों से पकड़े गए आवारा पशुओं को कई बार ग्रामीण क्षेत्रों और मुख्य सड़कों के आसपास छोड़ दिए जाने की शिकायतें सामने आती हैं। यदि ऐसा हो रहा है तो इस पर भी प्रभावी रोक लगाई जानी चाहिए।
जनप्रतिनिधियों, प्रशासन और गौशाला संचालकों से आमजन यह सवाल पूछ रहा है कि जब गौशालाओं के लिए भूमि, भवन, अनुदान और दान उपलब्ध हैं, तो फिर सड़कों पर बैठे गौवंश और उनसे होने वाली दुर्घटनाओं की जिम्मेदारी कौन लेगा?
गौ संरक्षण केवल नारों और भावनाओं का विषय नहीं, बल्कि व्यवस्थागत जिम्मेदारी का भी प्रश्न है। यदि गौवंश की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है तो उसे सड़कों से हटाकर सुरक्षित गौशालाओं तक पहुंचाना होगा, अन्यथा दुर्घटनाओं और विवादों का यह सिलसिला लगातार जारी रहेगा।




