चेन्नई से शहडोल तक करोड़ों की संपत्तियों का खेल आखिर किसके संरक्षण में चलता रहा
एनएमएसआई की रिपोर्ट ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
पेराम्बूर, चेन्नई की 1995 वर्ग फीट भूमि वर्ष 1974 में सीएसआई मद्रास डायोसीज़ को सौंप दी गई, लेकिन 2013 में फिर से पंजीयन कराए जाने पर चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। वहीं मद्रास के बिशप राइट रेव. डॉ. वी. देवसहायम ने इसे एनएमएसआई द्वारा दान की गई भूमि बताया।
दूसरी तरफ शहडोल की 16 एकड़ जमीन का मामला और भी विस्फोटक निकला।
रिपोर्ट के अनुसार 13 एकड़ जमीन पहले ही बेची जा चुकी थी और बाकी भूमि पर अतिक्रमण का खेल चलता रहा।
एनएमएसआई अधिकारियों की टीम जब शहडोल पहुंची तो जंगलों के बीच जान जोखिम में डालकर कार्रवाई करनी पड़ी।
रेव. डब्ल्यू. थॉमस और आई. ए. इमैनुएल की जान पर खतरा मंडराया, अपहरण की कोशिश तक की बातें सामने आईं।
इतना ही नहीं, 29 जुलाई 2013 को प्रताप सिंह, शीला और जेरिया अकिंस के खिलाफ शिकायत दर्ज हुई, जिसके बाद सीएसआर नंबर 426/2013 जारी किया गया।
मामला पुलिस और प्रशासनिक जांच तक पहुंचा लेकिन आज तक बड़ा सवाल यही है — आखिर कार्रवाई कहां तक पहुंची…?
रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि शहडोल संपत्ति से ₹40,55,000 की राशि प्राप्त कर जनरल फंड में जमा की गई और लगभग ₹30 लाख अतिरिक्त मिलने की संभावना जताई गई थी।

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शहडोल मिशन संपत्तियों का बड़ा खुलासा
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₹6.25 लाख की लागत से निर्मित चर्च 25 नवंबर 2011 को परमेश्वर की महिमा हेतु समर्पित किया गया। एम/एस अथिसयराज एवं स्टीफन परिवार इसके प्रमुख प्रायोजक रहे।
जब संपत्ति को सुरक्षित रखना मुश्किल हुआ, तब उसे मेडिकल सुपरिटेंडेंट कार्यालय के नाम स्थानांतरित करने की कोशिश की गई। इसी बीच डॉ. प्रयास कुमार प्रकाश ने आगे आकर लगभग ढाई एकड़ जमीन पर हुए अतिक्रमण को हटवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्थानीय नेताओं और एक विधायक पुत्र के कब्जे से भूमि मुक्त कराई गई।
03 जनवरी 2011 को NMSI मुख्यालय और शहडोल शाखा समिति के बीच MOU हुआ, जिसमें डॉ. प्रयास कुमार प्रकाश और डॉ. क्रिस्टी लुईस अब्राहम को स्थानीय संरक्षक बनाया गया। दस्तावेज शहडोल उप-पंजीयक कार्यालय में पंजीकृत किए गए।
अब “डॉ. रामाबाई मेमोरियल लाइफ लाइन क्रिश्चियन हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर” ICU, डायलिसिस और कार्डियक यूनिट जैसी सुविधाओं के साथ संचालित हो रहा है।
सबसे बड़ा खुलासा — शहडोल संपत्ति से अब तक ₹40,55,000 प्राप्त हुए, जिन्हें फिक्स्ड डिपॉजिट में रखा गया है, जबकि भविष्य में ₹30 लाख और मिलने की संभावना जताई गई है। कार्यकारिणी समिति ने फैसला लिया कि इस ब्याज राशि का उपयोग मिशनरी सहायता में किया जाएगा। “शेरवानी कंपनी” 1969 से किरायेदार बनी हुई है। फ्रीहोल्ड और लीजहोल्ड विवाद के कारण संपत्ति वापस लेना मुश्किल था। लेकिन डॉ. प्रयास कुमार प्रकाश की मदद से 1506 वर्ग फीट का जर्जर मकान ₹80 लाख में बेचने में सफलता मिली।
कुछ कहानी इस प्रकार थी
साल 1908… सेवा, मिशन और मानवता के नाम पर शुरू हुई एक संस्था।
रामाबाई क्रिश्चियन हॉस्पिटल को उस दौर में गरीबों, बीमारों और जरूरतमंदों के लिए आशा का केंद्र माना गया। मिशनरियों और समाजसेवियों ने इसे सिर्फ अस्पताल नहीं, बल्कि सेवा के आंदोलन के रूप में खड़ा किया। लेकिन 2026 आते-आते यही संस्थान अब करोड़ों की संपत्ति, ट्रस्ट नियंत्रण, राजनीतिक दखल और कथित आर्थिक षड्यंत्रों के आरोपों में घिरता दिखाई दे रहा है।
सूत्रों के अनुसार, अस्पताल और उससे जुड़ी संपत्तियों को लेकर पिछले कुछ वर्षों में अंदरखाने कई बैठकें हुईं। आरोप है कि मुंबई में हुई गोपनीय बैठकों में ट्रस्ट नियंत्रण बदलने, संपत्ति हस्तांतरण और वित्तीय फैसलों को लेकर रणनीति बनाई गई। इसी बीच लगभग 15 करोड़ रुपये के लेनदेन और फंड उपयोग को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
बताया जा रहा है कि अस्पताल प्रशासन के भीतर दो गुट सक्रिय हो गए थे। एक पक्ष खुद को संस्थान का “वास्तविक संरक्षक” बता रहा था, जबकि दूसरा पक्ष ट्रस्ट संचालन में अनियमितताओं का आरोप लगा रहा था। इसी खींचतान के बीच कई दस्तावेजों, बैठकों और निर्णयों की वैधता पर भी सवाल उठे।
मुंबई के बड़े अस्पतालों और ट्रस्टों में हाल के महीनों में जिस तरह विवाद सामने आए हैं, उन्होंने पूरे स्वास्थ्य क्षेत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मुंबई के कई चर्चित अस्पतालों में ट्रस्ट नियंत्रण, वित्तीय गड़बड़ियों और संपत्ति विवादों को लेकर जांच और कानूनी लड़ाइयाँ सामने आई हैं।
अब सवाल पुलिस विभाग की भूमिका पर भी उठ रहे हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि शिकायतों के बावजूद कार्रवाई में देरी हुई। कुछ लोगों का दावा है कि प्रभावशाली लोगों के दबाव में जांच की दिशा बदलने की कोशिश की गई। वहीं दूसरी ओर पुलिस सूत्रों का कहना है कि सभी दस्तावेजों और वित्तीय रिकॉर्ड की जांच की जा रही है और बिना प्रमाण किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित नहीं होगा।
सूत्रों के अनुसार, अस्पताल से जुड़े पुराने रिकॉर्ड, भूमि दस्तावेज, ट्रस्ट मीटिंग की कार्यवाही और बैंक लेनदेन अब जांच एजेंसियों के रडार पर हैं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला केवल आर्थिक अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि धार्मिक ट्रस्ट प्रबंधन और स्वास्थ्य संस्थानों की पारदर्शिता पर भी बड़ा सवाल बन सकता है।
1908 में सेवा के उद्देश्य से शुरू हुई यह कहानी अब 2026 में सत्ता, संपत्ति और संघर्ष की कहानी बनती दिख रही है।
क्या सच सामने आएगा?
क्या 15 करोड़ का कथित खेल केवल आर्थिक विवाद है या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है?


