
जबलपुर मध्यप्रदेश
जबलपुर । आज से ठीक 23 वर्ष पहले कारगिल में ‘आपरेशन-विजय” पूरा किया गया था। महीनों चले इस छद्म-युद्ध में देश के वीर-सपूतों ने दुश्मन-सेना के जवानों को उलटे पांव भागने मजबूर कर दिया था। इस दौरान जबलपुर के मेजर अजय कुमार ने भी अपने प्राणों की आहुति दी थी। इस युद्ध में फ्रंट-लाइन के सैनिकों का हौसला बढ़ाए रखने जहां सेना की ओर से हरसंभव प्रयास किए जा रहे थे, वहीं देश की तमाम आयुध निर्माणियों के साथ जबलपुर की निर्माणियां भी दिन-रात काम में लगी रहीं।
कहने के लिए तो कारगिल युद्ध दो महीने चला, लेकिन वास्तव में यह युद्ध 1999 में मार्च महीने के अंतिम दिनों से ही शुरू हो गया था। उस युद्ध के वक्त फ्रंट-लाइन में रहे योद्धाओं के अनुसार दोनों ही सेनाओं के बीच इस बात को लेकर सहमति बनीं कि बर्फबारी शुरू होने पर दोनों सेनाएं अपनी-अपनी चौकियों और बंकरों से छह महीने के लिए वापस चले जाएंगे। इस मामले में कारगिल युद्ध से ठीक पहले पाकिस्तानी सेना ने धोखा किया। उसके सैनिक पहले तो वापस चले गए, लेकिन कुछ महीनों बाद ही वो भारतीय सेना बंकरों में में आकर बैठकर गए। वो लोग काफी ऊपर थे, इसलिए उनकी नजर भारतीय सेना की गतिविधियों पर बराबर रही। इसके चलते मार्च-अप्रैल में जब भारतीय सैनिक अपनी पोस्टों की ओर चढ़ने लगे तो उन पर पाकिस्तानी सैनिकों ने गोलाबारी शुरू कर दी। भारतीय सैनिक नीचे रहे, इसलिए शुरूआत में तो हमारी सेना को बड़ा नुकसान हुआ। लेकिन जैसे ही यह युद्ध आर्गेनाइज-वे में आया, दुश्मनों के हौसले पस्त होने लगे।
मेजर अजय कुमार शहीद हुए

कारगिल युद्ध में योगदान के लिए जिन नामों को बड़े सम्मान की नजर से देखा जाता है, उन्हीं में से एक रहे हैं मेजर अजय कुमार। मेजर अजय कुमार का जबलपुर से गहरा नाता रहा। वो जबलपुर के रामपुर स्थित बृजमोहन नगर के निवासी रहे। युद्ध के समय उनकी पोस्टिंग मैकेनाइज-इन्फेंटरी में रही।
साथी सैनिक के सिर कटे शव ने खून खौलाया
उस वक्त अखनूर सेक्टर में तैनात रहे मेजर सुभाष तिवारी ने बताया कि वह जिस बटालियन में रहे, उसके एक सैनिक का सिर दुश्मन सेना के लोग काटकर साथ ले गए थे। साथी सैनिक की निर्मम हत्या ने हम सभी को विचलित कर दिया था। सभी आक्रोश में भरे हुए थे, जिसके चलते पूरी तैयारी के साथ हमारी एक टीम ने इंटेलीजेंस-बेस्ड आपरेशन चलाया। अत्यंत गोपनीय तरीके से रात ढाई बजे हमारा यह आपरेशन शुरू हुआ जो करीब साढ़े छह बजे कम्पलीट हुआ। हमने न केवल उनके बंकर को नष्ट किया बल्कि उनके 14-15 सैनिकों को एक ही बंकर के भीतर मौत के घाट उतार दिया। मरने वालों में पाकिस्तानी सेना का एक लेफ्टिनेंट जनरल भी रहा। इस आपरेशन में हमारे किसी भी सैनिक को खरोंच तक नहीं आई।
घर-परिवार सब सेना
मेजर सुभाष तिवारी बताते हैं कि जिस समय युद्ध हो रहा होता है, उस समय सैनिक सब कुछ भूल जाता है, उसे न तो भूख सताती है और न ही घर-बार की चिंता होती है। सेना ही उसका परिवार और विजय उसका लक्ष्य रहता है। हर सैनिक के मन में यही रहता है कि जब वह युद्ध से लौटे तो उसके हाथ में या तन पर तिरंगा हो।
बंकरों में मिली थी भरपूर रसद
जिन भारतीय बंकरों में कब्जा करके पाकिस्तानी सैनिक बैठे थे, उन बंकरों को जब भारतीय सेना ने वापस छुड़ाया, तो उनमें बड़ी मात्रा में शहद, ड्रायफ्रूट्स, स्टोव सहित अन्य प्रकार की रसद पाई गई थी। इससे यह पता चल रहा था कि दुश्मन सैनिक और मिलिटेंस काफी पहले से वहां पोजीशन लेकर बैठे हुए थे, उनको भारतीय सेना के लौटने का इंतजार रहा।
दुश्मन देख रहा है सिर झुकाकर चलें
कारगिल युद्ध में दुश्मन ऊपर बैठा था, जरा सी चूक या मूवमेंट का अंदाजा लगते ही दुश्मन की ओर से गोलीबारी शुरू हो जाती थी। इसलिए पहाड़ के पत्थरों पर लिख दिया गया था कि ‘दुश्मन देख रहा है, सिर झुकाकर चलें। भारतीय सेना पहाड़ में नीचे थी, जबकि दुश्मन सिर के ऊपर। परिस्थितियां पूरी तरह से प्रतिकूल रहीं। फिर भी भारत के बीव सैनिकों ने इस युद्ध में जीत हासिल करके यह बता दिया कि लड़ाइयां हौंसलों से जीती जाती हैं, केवल हथियारों से नहीं।
निर्माणियों ने दिया अहम योगदान
जबलपुर शहर की तमाम आयुध निर्माणियों ने कारगिल युद्ध के समय भरपूर योगदान दिया था। जीसीएफ की बोफोर्स जहां गोले दाग रही थी, वहीं ओएफके के फिल्का बम, स्मोक बम सहित अन्य प्रकार के प्रोडक्ट सेना को ताकत प्रदान कर रहे थे। निर्माणियों में उत्पादन दिन-रात चालू रहा। ओएफके में उस वक्त रहे जीएम पीके मिश्रा ने कामगारों में ऐसा हौसला भर दिया था मानो निर्माणियां भी फ्रंट-लाइन पर आकर लड़ रही हों



