घंसौर
हमारी मीडिया टीम जब मौके पर पहुंची, तो प्रचार और दो शिक्षक अनुपस्थित थे। स्कूल की हालत भी चिंताजनक थी—चारों ओर गंदगी फैली थी और महापुरुषों की तस्वीरें भी अव्यवस्थित ढंग से लगाई गई थीं। आखिर शिक्षा विभाग कब जागेगा और कब सुधरेगी बच्चों के भविष्य की नींव? निरीक्षण और कार्रवाई की सख्त ज़रूरत है।
सिवनी कलेक्टर मैडम ऐसे स्कूलों का निरीक्षण आखिर कब करेंगी, जहां बच्चों का भविष्य खतरे में है? घंसौर के बीआरसीसी अपने कार्यालय की कुर्सी पर आराम फरमा रहे हैं, जबकि ज़मीनी हकीकत से बेखबर हैं। एक स्कूल में 130 से अधिक बच्चे पढ़ रहे हैं, लेकिन वहां व्यवस्था नाम मात्र की है। जन शिक्षक भी इस स्थिति पर मौन साधे हुए हैं – क्यों नहीं उठ रही आवाज़? क्या बच्चों के भविष्य की कोई चिंता नहीं? शासन की योजनाएं कागज़ों में सिमट कर रह गई हैं और ज़मीनी स्तर पर शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन आंखें खोलेगा या बच्चों का भविष्य ऐसे ही अंधकार में रहेगा? कलेक्टर से अपेक्षा है कि वे स्वयं स्कूलों का औचक निरीक्षण करें और लापरवाह अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो।
सूरजपुरा शासकीय माध्यमिक विद्यालय में शिक्षा व्यवस्था राम भरोसे, गाजर घास और गंदगी के बीच बच्चों का भविष्य अधर में
सिवनी (घंसौर क्षेत्र) संवाददाता।
सूरजपुरा शासकीय माध्यमिक विद्यालय की स्थिति देखकर कोई भी यह नहीं कह सकता कि यह स्कूल शिक्षा का मंदिर है। चारों ओर बड़ी-बड़ी गाजर घास उगी हुई हैं, स्कूल के खिड़कियों के पास कचरे के ढेर लगे हैं और कक्षाओं में सीलन और बरसात का पानी भरा रहता है।
शिक्षकों की लापरवाही:
सूत्रों के अनुसार, शिक्षक नियमित रूप से समय पर स्कूल नहीं पहुंचते। जब कैमरे के सामने सवाल पूछा गया तो एक शिक्षक ने जवाब दिया, “मैं रोड में खड़ा था इसलिए देर हो गई,” जबकि स्कूल समय पर खोलने का मापदंड है और GPS लोकेशन के साथ उपस्थिति भेजनी होती है। बच्चों से बात करने पर पता चला कि वे समय पर स्कूल पहुंच जाते हैं, लेकिन शिक्षक अक्सर देर से आते हैं।
मरम्मत के नाम पर बंदरबांट:
कुछ समय पहले स्कूल की मरम्मत के लिए लाखों रुपए आए थे, लेकिन सूत्रों का कहना है कि वह फंड केवल कागजों में खर्च हुआ। आज भी स्कूल की हालत पहले जैसी ही है – बरसात के दिनों में पानी भर जाता है, दीवारें सीलन से कमजोर हैं और शौचालय की हालत भी दयनीय है।
जन शिक्षक की चुप्पी:
प्रश्न यह है कि अगर सालों से जन शिक्षक निरीक्षण कर रहे हैं तो सुधार क्यों नहीं हुआ? क्या निरीक्षण सिर्फ खानापूर्ति के लिए होता है?
क्या भूत बंगला बन चुका है विद्यालय?
विद्यालय की स्थिति ऐसी हो गई है कि यदि कोई अधिकारी आकर देखे, तो लगेगा कि यह कोई परित्यक्त भवन है। बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है, लेकिन शिक्षक अपनी सैलरी समय पर ले रहे हैं।
अब सवाल यह है:
सरकार द्वारा समय पर फंड भेजा जा रहा है, तो उसका उपयोग क्यों नहीं हो रहा?
शिक्षकों की लापरवाही पर कार्रवाई कब होगी?
क्या शिक्षा विभाग केवल कागजों पर सुधार कर रहा है?
और सबसे बड़ा सवाल – बच्चों का भविष्य किसके भरोसे?
निष्कर्ष:
सूरजपुरा विद्यालय सिर्फ एक उदाहरण है, पूरे जिले में कई सरकारी स्कूलों की स्थिति ऐसी ही है। अब वक्त आ गया है कि जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग और जनप्रतिनिधि इस ओर गंभीरता से ध्यान दें और शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाएं।





