दुलीचंद मार्को संवाददाता
निवास/ मण्डला – विकासखंड शिक्षा कार्यालय निवास में मई 2024 में बावन लाख पेंतालिस हजार रुपये के गबन का मामला सामने आया। इस घोटाले के खुलासे के बाद विभागीय कार्रवाई में काफी समय लगा। इसमें बीईओ और 11 कर्मचारियों के खिलाफ निवास थाना में (एसी) लाल शाह जगेत द्वारा एफआईआर दर्ज की गई। दो दिनों तक चली इस कार्रवाई के बाद अधिकांश आरोपी फरार हो गए, जिनमें से 9 को पुलिस अब तक ढूंढ नहीं पाई है।
मुख्य आरोपी, जो एक कंप्यूटर ऑपरेटर है, ने स्वयं सरेंडर किया और वर्तमान में जेल में है। वहीं, तत्कालीन बीईओ शोभा अय्यर हाई कोर्ट से अग्रिम जमानत पर हैं। सवाल यह है कि क्या अग्रिम जमानत प्राप्त करने वाले दोषी वास्तव में दोषमुक्त हो गए हैं? 7 मई 2024 को ट्रेजरी विभाग की टीम ने बीईओ कार्यालय से संबंधित फर्जी भुगतान के रिकॉर्ड की जांच की। जांच में पाया गया कि बावन लाख सैंतालीस हजार रुपये का गबन हुआ है। इसमें मृत शिक्षकों की पेंशन के साथ-साथ उनकी मासिक वेतन और छात्रों की छात्रवृत्ति की राशि का बंदरबांट हुआ। यह सब कुछ कंप्यूटर ऑपरेटर के सहयोग से हुआ, और इसमें तत्कालीन बीईओ का पासवर्ड बिना कोई भी कार्रवाई संभव नहीं थी।
विभागीय कार्रवाई में अनियमितता-
शिक्षा विभाग में हुए इस वित्तीय भ्रष्टाचार में संबंधित अधिकारियों की भूमिका साफ-साफ नजर आ रही है। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारी उनके प्रति नरम रुख अपनाए हुए हैं। इसीलिए आज तक किसी भी दोषी अधिकारी पर निलंबन जैसी कार्रवाई नहीं की गई। बल्कि सूत्रों की जानकारी के अनुसार आरोपित शोभा अय्यर और पूर्व बी ईओ आनंद जैन को 7 अक्टूबर 2024 को भोपाल जनजाति कार्य विभाग मंत्रालय से उच्च पद पर आसीन किया गया, जो कि गहरा आश्चर्य पैदा करता है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, विवादित बी ईओ की नई पदस्थापना की जगह कोई अन्य कर्मचारी प्रभार संभाले हुए हैं। एक बड़े घोटाले में संलिप्तता के बावजूद उन्हें उच्च पद पर नियुक्त करना कई प्रशासनिक लापरवाहियों को उजागर करता है। यह भी संभव है कि इस मामले की जानकारी आयुक्त कार्यालय और जनजाति कार्य विभाग मंत्रालय भोपाल को नहीं दी गई हो।
आम आदमी और अधिकारियों का दोहरा मापदंड-
बड़ा सवाल यह है कि जब आम आदमी सरकारी राजस्व में कोताही करता है, तो शासन उन पर कठोर कार्रवाई करता है। लेकिन जब शासकीय धनराशि और छात्रों की छात्रवृत्ति पर डाका डालने वाले आरोपी पुरस्कृत किए जा रहे हैं, तो यह पीड़ितों के लिए एक बड़ा अन्याय है। इससे यह प्रतीत होता है कि शासन-प्रशासन के लिए शासकीय धन की अहमियत आम नागरिक से कम है। यह मामला न केवल भ्रष्टाचार की गंभीरता को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस तरह से प्रशासनिक तंत्र दोषियों को संरक्षण प्रदान कर रहा है। जब ऐसे मामले सामने आते हैं, तब आम नागरिक की न्याय की उम्मीदें धुंधली पड़ जाती हैं। न्याय की इस विफलता के कारण समाज में असंतोष और निराशा का माहौल बनता है, जो भविष्य में व्यवस्था के प्रति विश्वास को और कमजोर करता है। इस घोटाले से जुड़े सभी पहलुओं की गहन जांच और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की आवश्यकता है, ताकि ऐसी घटनाएं फिर से न हों और पीड़ितों को न्याय मिल सके।





